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सफ़र ही शर्त-ए-सफ़र है तो ख़त्म क्या होगा

दिल-ए-शोरीदा की वहशत नहीं देखी जाती

दिल की राहें ढूँडने जब हम चले

मुद्दत से लापता है ख़ुदा जाने क्या हुआ

कभी ज़बाँ पे न आया के आरज़ू क्या है

दीदनी है ज़ख़्म-ए-दिल और आप से पर्दा भी क्या

याद आएँ जो अय्याम-ए-बहाराँ तो किधर जाएँ

ये हम से पूछते हो रंज-ए-इम्तिहाँ क्या है

आज भी दश्त-ए-बला में नहर पर पहरा रहा

आज भी दश्त-ए-बला में नहर पर पहरा रहा

कहें किस से हमारा खो गया क्या