शाम ज़ुल्फ़ों में ढल

शाम ज़ुल्फ़ों में ढल गई जैसे।
शब की हसरत मचल गई जैसे।

दोस्त कितने सवाल करते है,
मेरी किस्मत बदल गई जैसे।

कोई सूरत निकाल लो तुम ही,
अपनी आदत बदल गई जैसे।

प्यास मेरी तलाश करने को,
एक दरिया मचल गई जैसे।

देर कर दी मगर मलाल नहीं,
सीधे दिल में उतर गई जैसे।

बाअदब वर्क़ सी लहराती हुई,
रौशनी बन चमक गई जैसे।

फिर 'अदब' ज़िंदगी ग़ुलाब हुई,
कोई खुशबू बिखर गई जैसे।

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