गम इस कदर बरस

गम इस कदर बरस पड़े, सावन भी शर्मशार हो
इस हिज़र मे दो आँखों की कुद्रत से तक़रार हो
हर सिलसिला रुका रहे, हर ज़लज़ला बुझा रहे
ठहरी अंधेरी रात मे खामोशी की झंकार हो
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