रोज़ तड़प्ते है हम
दिल को जलते भी है हम
कुछ तो होगा हक़ मैं बेहतर
ये कह कर बहलाते भी हैं
टूट कर जो बिखरे हैं सपने सारे
हम चाँदनी रातों मैं उन को सजाते भी हैं
उन की बेवफ़ाई का सोग मानते भी हैं
तन्हा बेत कर रोते है हम
ओर महफ़िल मैं मुस्कुराते भी हैं हम
वो बेवफा है यक़ीन होता नही हूमें
दिल को आइस बात का अक्सर यक़ीन दिलाते भी हैं…
दिल को जलते भी है हम
कुछ तो होगा हक़ मैं बेहतर
ये कह कर बहलाते भी हैं
टूट कर जो बिखरे हैं सपने सारे
हम चाँदनी रातों मैं उन को सजाते भी हैं
उन की बेवफ़ाई का सोग मानते भी हैं
तन्हा बेत कर रोते है हम
ओर महफ़िल मैं मुस्कुराते भी हैं हम
वो बेवफा है यक़ीन होता नही हूमें
दिल को आइस बात का अक्सर यक़ीन दिलाते भी हैं…

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