मेरे खत वो पढ़ कर

मेरे खत वो पढ़ कर यूँ जला दिया करते हैं,
ऐसा लगता हैं मेरे अरमानों का वो कटाल कर दिया करते हैं

जल कर वो टुकड़े यूँ मेरे दामन में बिच्छ जाते हैं
आख़िर क्यूँ, मेरे खत का जवाब वो यूँ दिया करते हैं

खफा थे मुझसे वो, में मानने के लिए था राज़ी,
हज़ारों खवैशे में मिटाने के लिए था राज़ी,

अपनी तमन्नाओं को दबाने के लिए था राज़ी,
मगर वो चाहने वालों पे नज़र कहा दिया करते हैं,

साँसों में महेकता हैं आज भीइ उनका अहसास,
किस तरह डोर कर पौँगा ऐसे जज़्बात,

फिर से आज सोने की कोशिश में हूँ जुटा, रात कुछ थमी सी हैं,
बड़ी ज़ोरो किी हैं बरसात, भीग जाना कहा मुनासिब हैं,
उनके दिए अश्क हिी मुझे बीघो दिया करते हैं

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